इत्युक्तवन्तं परिरभ्य दोर्भ्यां
तनूजमाविष्कृतदिव्यमूर्तिः ।
अघोपघातं मघवा विभूत्यै
भवोद्भवाराधनमादिदेश ॥
इत्युक्तवन्तं परिरभ्य दोर्भ्यां
तनूजमाविष्कृतदिव्यमूर्तिः ।
अघोपघातं मघवा विभूत्यै
भवोद्भवाराधनमादिदेश ॥
तनूजमाविष्कृतदिव्यमूर्तिः ।
अघोपघातं मघवा विभूत्यै
भवोद्भवाराधनमादिदेश ॥
सारांश
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अर्जुन के ऐसा कहने पर इंद्र ने उन्हें गले लगाया और उनके कल्याण हेतु भगवान शिव की आराधना का आदेश दिया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
इतीति॥ मघवेन्द्र इत्युक्तवन्तं तनूजं पुत्रमर्जुनम्। आविष्कृता प्रकटिता दिव्यमूर्तिर्निजरूपं येन स तथोक्तः सन् । दोर्भ्यां बाहुभ्यां परिरभ्य विभूत्यै श्रेयसे । उपहन्यतेऽनेनेत्युपघातम् । करणे घञ्प्रत्ययः । अघानां दुःखानामुपघातमघोपघातं भवः संसारस्तस्योद्भवः कारणमिति भवोद्भवः शिवस्तस्याराधनमुपासनमादिदेश । शिवमुद्दिश्य तपश्चरेत्याज्ञापयामासेत्यर्थः ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्यु | क्त | व | न्तं | प | रि | र | भ्य | दो | र्भ्यां |
| त | नू | ज | मा | वि | ष्कृ | त | दि | व्य | मू | र्तिः |
| अ | घो | प | घा | तं | म | घ | वा | वि | भू | त्यै |
| भ | वो | द्भ | वा | रा | ध | न | मा | दि | दे | श |
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