सारांश
AI
या तो मैं पर्वत पर बादलों की तरह नष्ट हो जाऊँगा या इंद्र की कृपा से अपने अपयश के कांटे को निकाल दूँगा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विच्छिन्नेति ॥ विच्छिन्नं वाताहतं यदभ्रं तदिव विलीयेति विच्छिन्नाभ्रविलायं यथा तथा ।
उपमाने कर्मणि च (अष्टाध्यायी ३.४.४५ ) इति कर्तर्युपपदे णमुल् । नगमूर्धन्यस्मिन्गिरिशृङ्गे विलीये विशीर्ये वा । कषादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः । यद्वा सहस्राक्षमिन्द्रमाराध्यायश एव शल्यं तदुद्धर उद्धरिष्यामि । न तु गत्यन्तरशङ्केत्यर्थः । वाशब्दो विकल्पे ।
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | च्छि | न्ना | भ्र | वि | ला | यं | वा |
| वि | ली | ये | न | ग | मू | र्ध | नि |
| आ | रा | ध्य | वा | स | ह | स्रा | क्ष |
| म | य | शः | श | ल्य | मु | द्ध | रे |
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.