सारांश
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मान-सम्मान वाले व्यक्ति अपने धर्म पर अडिग रहते हैं; वे शत्रुओं का अपमान सहकर युद्ध से पलायन नहीं करते।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स्वधर्ममिति ॥ मानशालिनः स्वधर्मं क्षात्रधर्ममनुरुन्धन्तेऽनुवर्तन्ते । अतिक्रमं स्वधर्मातिक्रमं नानुरुन्धन्ते । ततः किमत आह-अरातिभिरिति । अरातिभित्कृतध्वंसाः कृतापकाराः सन्त आहवान्न पलायन्ते । अयमेव स्वधर्मानुरोध इत्यर्थः ।
उपसर्गस्यायतौ (अष्टाध्यायी ८.२.१९ ) इति रेफस्स लत्वम् । अत्र मनु:—न निवर्तेत सङ्ग्रामात्क्षात्रधर्ममनुस्मरन् इति । अत्रोत्तरवाक्यार्थं प्रति पूर्ववाक्यार्थस्य हेतुत्वाद्वाक्यार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलंकारः ॥ किंबहुना ममायं निश्चयः श्रूयतामित्याह
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्व | ध | र्म | म | नु | रु | न्ध | न्ते |
| ना | ति | क्र | म | म | रा | ति | भिः |
| प | ला | य | न्ते | कृ | त | ध्वं | सा |
| ना | ह | वा | न्मा | न | शा | लि | नः |
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