सारांश
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कुल का भार, माता की ममता और ज्येष्ठ भ्राता के प्रति मर्यादा मेरी स्वतंत्रता को नियंत्रित करती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
आसक्तेति ॥ आसक्ता लग्ना। अवश्यं कर्तव्येत्यर्थः । रूढा प्रसिद्धा । महतीत्यर्थः। इयं पूर्वोक्ता धूर्वैरनिर्यातनभारः । दूरगा दूरवर्तिनी जननी च मातापि । तथा नृपोऽप्याचारवान् । तपोधिक इत्यर्थः । तत्रापि ज्यायाञ्ज्येष्ठो नृपो युधिष्ठिरश्च मे मम स्वातन्त्र्यं स्वाच्छन्द्यं तिरस्करोति दूरीकरोति। आश्रमान्तरं प्रतिबध्नातीत्यर्थ:।तिरस्करोतीति प्रत्येकमभिसंबध्यते । अन्यथा बहुवचनप्रसङ्गात् ॥ उक्तमर्थमुपसंहरति
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | स | क्ता | धू | रि | यं | रू | ढा |
| ज | न | नी | दू | र | गा | च | मे |
| ति | र | स्क | रो | ति | स्वा | त | न्त्र्यं |
| ज्या | यां | श्चा | चा | र | वा | न्नृ | पः |
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