सारांश
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संकट के समय यदि राजा की आज्ञा व्यर्थ हो जाए, तो वह अपने स्वच्छ वंश के लिए चंद्रमा के कलंक के समान होता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स इति । स नरोऽवदातस्य स्वच्छस्य वंशस्य शशाङ्कस्येव लाञ्छनं कलङ्कः। यत्र यस्मिन्पुरुषे कृच्छ्रेषु व्यसनेषु भर्तुः स्वामिन आज्ञया व्यर्थया भूयते । भावे लट् । आपदि स्वार्थसाधकः कुलघातकः । तत्कथं स्वार्थनिष्ठकार्यता युक्तेत्यर्थः ॥ यदुक्तम्
विजहीहि रणोत्साहम् इत्यादि, तत्रोत्तरमाह
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | वं | श | स्या | व | दा | त | स्य |
| श | शा | ङ्क | स्ये | व | ला | ञ्छ | नम् |
| कृ | च्छ्रे | षु | व्य | र्थ | या | य | त्र |
| भू | य | ते | भ | र्तु | रा | ज्ञ | या |
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