सारांश
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अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार शत्रुओं से प्रतिशोध लेने के लिए प्यासे व्यक्ति की भांति मेरे ज्येष्ठ भ्राता मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
यथेति ॥ नृपतिर्युधिष्ठिरो यथाप्रतिज्ञं युधि द्विषतां प्रतिचिकीर्षया द्विषतः प्रतिकर्तुमिच्छया । प्रतिज्ञानुसारेणैव जिघांसोत्यर्थः । तृष्यन्पिपासुर्जलाञ्जलेरिव ममैवाध्येतीच्छति कार्यसिद्धेर्मुदायत्तत्वान्मामेव स्मरति । अतोऽयं ममाभिनिवेश इत्यर्थः ।
अधीगर्थ- (अष्टाध्यायी २.३.५२ ) इत्यादिना कर्मणि षष्ठी ॥ ननु युधिष्ठिरः स्वार्थं साधयति । त्वया च स्वार्थमात्रमनुसंधीयतामित्यत आह
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | था | प्र | ति | ज्ञं | द्वि | ष | तां |
| यु | धि | प्र | ति | चि | की | र्ष | या |
| म | मै | वा | ध्ये | ति | नृ | प | ति |
| स्तृ | ष्य | न्नि | व | ज | ला | ञ्ज | लेः |
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