सारांश
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सच्चा पुरुष वही है जिसके तेज और गौरव के कारण शत्रु भी सभा में विवश होकर उसके नाम का सम्मान करते हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
ग्रसमानमिति ॥ किं च । सदसा सभया गौरवेणेरितं कथाप्रसङ्गेषु गौरवपूर्वकमुच्चारितम्। सत ओजांसि शृण्वतां तेजांसि ग्रसमानं गिलदिव स्थितं यस्य पुंसो नाम द्विषोऽप्यभिनन्दन्त्यनुमोदन्ते । किमुत सुहृद इति भावः । स पुमान्पुमान् । पुरुषत्वेन गण्यत इत्यर्थः । प्रथमः पुंशब्दो जातिवचनो द्वितीयो गुणवचनः । स एव श्लाघ्य: । अत्र पुमान्पुमानिति तात्पर्यमात्रभेदभिन्नशब्दार्थपौनरुक्यलक्षणो लाटानुप्रासोऽलंकारः। तथा च सूत्रम्-
तात्पर्यभेदयुक्तो लाटानुप्रासः इति ॥ ननु सत्सु भीमादिषु तवैवायं कोऽभिनिवेश इत्यत्राह
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग्र | स | मा | न | मि | वौ | जां | सि |
| स | द | सा | गौ | र | वे | रि | तम् |
| ना | म | य | स्या | भि | न | न्द | न्ति |
| द्वि | षो | ऽपि | स | पु | मा | न्पु | मान् |
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