सारांश
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केवल जन्म से पुरुष होना व्यर्थ है। वास्तविक पुरुष वही है जो अपने गुणों से संसार में विस्मय और प्रशंसा का पात्र बने।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
जातिमात्रावलम्बिना जातिमात्राभिधायिना पुरुषशब्देन कृतमलम् । न तेन किंचित्साध्यत इत्यर्थः । अत्र गम्यमानसाधनक्रियापेक्षया करणत्वात्तृतीयेत्युक्तं प्राक् । कृतमिति निषेधार्थमव्ययं चादिषु पठ्यते । सत्यं जातिमात्रेऽपि पुरुषशब्दः प्रवर्तते । परंतु नासौ पुंसामाशास्यः। पश्वादिसाधारण्यादिति तात्पर्यार्थः। तर्हि कीदृक्श्लाघ्य इत्याशंक्याहय इत्यादिनार्थद्वयेन । अङ्गीकृतगुणैर्गुणपक्षपातिभिर्यः पुमाञ्श्लाघ्य: स्तुत्यः सन्सविस्मयं ससंभ्रममुदाहृतः कथितः । पुंसेदृशेन भवितव्यमिति निदर्शितः ॥
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | तं | पु | रु | ष | श | ब्दे | न |
| जा | ति | मा | त्रा | व | ल | म्बि | ना |
| यो | ऽङ्गी | कृ | त | गु | णैः | श्ला | घ्यः |
| स | वि | स्म | य | मु | दा | हृ | तः |
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