सारांश
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हे तपोधन, जिस व्यक्ति का क्रोध शत्रुओं को पराजित किए बिना ही शांत हो जाए, वह पुरुष कहलाने योग्य कैसे है?
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अनिर्जयेनेति ॥ यस्यामर्षः क्रोधो द्विषतां शत्रूणामनिर्जयेन निर्जयं विनैव प्रशाम्यति। उपलक्षणे तृतीया । तस्मिन्पुरुष इत्युक्तिः पुरुषशब्दः कथम् । नं कथंचिदित्यर्थः। प्रवर्तत इति शेषः । प्रवृत्तिनिमित्तस्य पुरुषकारस्याभावादिति भावः । हे तपोधन, त्वं हि त्वमेव ब्रूहि कथय। न च ते किंचिदविदितमस्तीति भावः।
हि हेताववधारणे इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२७२ ) ॥ ननु पुरुषत्वजात्यैव पुरुषोक्तिप्रवृत्तेः किं पुरुषकारेण । तत्राह-कृतमित्यादिद्वयेन ॥
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | नि | र्ज | ये | न | द्वि | ष | तां |
| य | स्या | म | र्षः | प्र | शा | म्य | ति |
| पु | रु | षो | क्तिः | क | थं | त | स्मि |
| न्ब्रू | हि | त्वं | हि | त | पो | ध | न |
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