सारांश
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वह पुरुष जीवित होकर भी मृत है जो अपने पराक्रम से शत्रुओं द्वारा छीने गए यश को पुनः प्राप्त नहीं कर लेता।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अजन्मेति॥ पुरुषो यावदरिभिर्विलुप्तं संहृतं यश इषुभिर्नादत्ते। अरिवधेन न प्रत्याहरतीत्यर्थः । तावदजन्मा। अजातप्राय इत्यर्थः। नन्वजातोऽपि जननानन्तरमुपयुज्यत एवेत्यरुच्या पक्षान्तरमाह-गतासुर्मृतः । मृततुल्य इत्यर्थः । मृतोऽपि प्रागुपयुक्तवानित्यरुच्याह -तृणमेवेति । तृणतुल्य इत्यर्थः । अकिम्चित्करस्य त्रैकाल्यानुपयोगाज्जीवन्मृत इत्यर्थः । अतो नाहमाग्रहाद्ब्रवीमि । किं तु वीरधर्ममनुपालयामीति भावः ॥ सर्वथा वैरिनिर्यातनं कर्तव्यमित्युक्तम् । तदकरणे पुरुषगुणानां हानिदोषमाह
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ज | न्मा | पु | रु | ष | स्ता | व |
| द्ग | ता | सु | स्तृ | ण | मे | व | वा |
| या | व | न्ने | षु | भि | रा | द | त्ते |
| वि | लु | प्त | म | रि | भि | र्य | शः |
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