सारांश
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शत्रुओं का नाश कर वंश की लक्ष्मी को वापस पाए बिना मैं मोक्ष को भी विजय के मार्ग की बाधा मानता हूँ।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
वंशेति ॥ अहं तु विद्विषां शत्रूणां समुच्छेदेन विनाशेन करणेन वंशलक्ष्मीमनुद्धृत्यापुनरावर्त्य निर्वाणं मोक्षमपि जयश्रियोऽन्तरायं विघ्नं मन्ये । न तु पुरुषार्थमित्यर्थः । किमुतान्योत्सवादिकमिति भावः ॥ नन्वयं ते दुराग्रह इत्यत आह
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वं | श | ल | क्ष्मी | म | नु | द्धृ | त्य |
| स | मु | च्छे | दे | न | वि | द्वि | षाम् |
| नि | र्वा | ण | म | पि | म | न्ये | ऽह |
| म | न्त | रा | यं | ज | य | श्रि | यः |
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