अन्वयः
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अप्राकृत-आकृतिः आक्रान्त-लक्ष्मीकः (सः) जरतीम् तनुम् बिभ्राणः अपि, आश्रयम् स-साध्वसम् इव चकार ।
English Summary
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He, of uncommon form and possessing a lustre that surpassed mere beauty, made the hermitage seem filled with awe, even while bearing an aged body.
सारांश
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वृद्ध शरीर धारण करने पर भी उनके अलौकिक रूप और तेज ने आश्रम को विस्मय और आदर से भर दिया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
जरतीमिति ॥ जरतीं जीर्णाम्।
जीनो जीर्णो जरन्नपि इत्यमरः (अमरकोशः २.६.४२ ) । जीर्यतेरतीतार्थे शतृप्रत्ययः । उगितश्च (अष्टाध्यायी ४.१.६ ) इति ङीप् । तनुं शरीरं बिभ्राणो दधदप्यप्राकृता लोकसामान्याकृतिर्मूर्तिर्यस्य स इन्द्र आक्रान्ताभिभूता लक्ष्मीराश्रमशोभा येन स आक्रान्तलक्ष्मीकः। अत्र उर:प्रभतिभ्यः कप् इति नित्यकबाश्रयणम् । एकवचनोत्तरपदस्यैव लक्ष्मीशब्दस्योरःप्रभृतिषु पाठात्।शेषाद्विभाषा (अष्टाध्यायी ५.४.१५४ ) इति विकल्पाश्रयणे तु बहुवचनोत्तरपद इति विवेकः । आश्रमं ससाध्वसमिव चकार । तेजस्विदर्शनाद्भयं भवति । तत्तु न दुःखजनकं तस्यामानुपत्वादिति सूचयितुमिवशब्दः॥
पदच्छेदः
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| जरतीम् | जरत् (२.१) | aged |
| अपि | अपि | even |
| बिभ्राणः | बिभ्राण (√भृ+शानच्, १.१) | bearing |
| तनुम् | तनु (२.१) | body |
| अप्राकृताकृतिः | अप्राकृत–आकृति (१.१) | of uncommon form |
| चकार | चकार (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made |
| आक्रान्तलक्ष्मीकः | आक्रान्त–लक्ष्मीक (१.१) | whose beauty was surpassed |
| ससाध्वसम् | ससाध्वसम् | with awe |
| इव | इव | as it were |
| आश्रयम् | आश्रय (२.१) | the hermitage |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | र | ती | म | पि | बि | भ्रा | ण |
| स्त | नु | म | प्रा | कृ | ता | कृ | तिः |
| च | का | रा | क्रा | न्त | ल | क्ष्मी | कः |
| स | सा | ध्व | स | मि | वा | श्र | यम् |
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