सारांश
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चाहे विद्वान मेरी हँसी उड़ाएं या आप लज्जित हों, मैं अपने संकल्प से पीछे नहीं हटूंगा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अपहस्य इत्यादि ॥ अथवा सद्भिः पण्डितैरपहस्ये। अपहसिष्य इत्यर्थः ।
वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा (अष्टाध्यायी ३.३.१३१ ) इति हसतेरण्यन्तात्कर्मणि लट्। ण्यन्तस्तु भ्रान्तपाठः। मेधियः प्रमादोऽनवधानत्वं वास्तु । भवानप्यस्थानेऽयोग्यविषये विहित आयासो हितोपदेशप्रयासो येन स तथोक्तः। विफलप्रयत्नः सन्नित्यर्थः । कामं जिह्वेतु लज्जताम् ॥
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | प | ह | स्ये | ऽथ | वा | स | द्भिः |
| प्र | मा | दो | वा | स्तु | मे | धि | यः |
| अ | स्था | न | वि | हि | ता | या | सः |
| का | मं | जि | ह्रे | तु | वा | भ | वान् |
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