सारांश
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मैं शत्रुओं की स्त्रियों के वैधव्य के आंसुओं से अपने अपयश रूपी कलंक को धोना चाहता हूँ।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
प्रमार्ष्टुमिति ॥ किंतु च्छद्मना कपटेन कृतम् । शत्रुभिरिति शेषः । अयश एक पङ्कमिति रूपकालंकारः । वैधव्येन तापितानां दुःखीकृतानामरातिवनितानां लोचनाम्बुभिः प्रमाष्टुं क्षालयितुमिच्छेयमभिलषेयम्। इषिधातोर्लिङि रूपम्। वैरनिर्यातनातिरिक्तं न किंचिदिच्छामीत्यर्थः ॥ एवं तर्हि
यः करोति वधोदर्का: इत्यायुक्तदोषः स्यादित्याशङ्कामङ्गीकृत्य ग्लानिर्न दोषायेति न्यायमाश्रित्य युग्मेनोत्तरमाह
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | मा | र्ष्टु | म | य | शः | प | ङ्क |
| मि | च्छे | यं | छ | द्म | ना | कृ | तम् |
| वै | ध | व्य | ता | पि | ता | रा | ति |
| व | नि | ता | लो | च | ना | म्बु | भिः |
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