सारांश
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जिनके उज्ज्वल यश से चंद्रमा की आभा फीकी पड़ जाए, वे ही अपने वंश को गौरव दिलाते हैं और पृथ्वी को सार्थक करते हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
गुरूनिति ॥ ते नरा वंश्यानन्वये भवान्गुरून्कुर्वन्ति प्रथयन्ति । स्वनाम्ना व्यपदेशयन्ति रघुदिलीपादिवदित्यर्थः। तैर्नरैः। वसूनि धनानि धरतीति वसुंधरा।
संज्ञाया भृतृवृजि- इत्यादिना खच्प्रत्यये खचि ह्रस्वः (अष्टाध्यायी ६.४.९४ ) इति ह्रस्वान्नुमागमश्च । अन्वर्थानुगतार्था । तेषां वसुभूतानां धारणादिति भावः । येषां शुभ्राणि यशांसीन्दुमण्डलं ह्रेपयन्ति लज्जयन्ति। यशसो निष्कलङ्कत्वादिति भाव: । ईदृशं हि यशोमानमहत एव संभवतीति तात्पर्यार्थः। ह्रीधातोर्ण्यन्ताल्लट्।अर्तिह्नि-इत्यादिना पुगागमः। अत्र ह्रेपणस्य सादृश्यपर्यवसानादुपमालंकारः॥ उदाहरणमाशी:षु प्रथमे ते मनस्विनाम् । शुष्केऽशनिरिवामर्षों यैररातिषु पात्यते
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गु | रू | न्कु | र्व | न्ति | ते | वं | श्या |
| न | न्व | र्था | तै | र्व | सुं | ध | रा |
| ये | षां | य | शां | सि | शु | भ्रा | णि |
| ह्रे | प | य | न्ती | न्दु | म | ण्ड | लम् |
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