सारांश
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जिस प्रकार दुर्गम पर्वत भी पार किया जा सकता है, वैसे ही स्वाभिमानी और तेजस्वी व्यक्ति की गरिमा उसे कभी नहीं छोड़ती।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स्वयमिति ॥ एवं हरिसुतेऽर्जुने स्वयमखण्डेनाविलुप्तेन तपसा शतमखमिन्द्रं संराध्य प्रीणयित्वा परोच्छित्त्या शत्रुवधेन लभ्यां साध्यां लक्ष्मीं राजलक्ष्मीमभिलषति सति सोद्वेगैः कार्यसिद्ध्यभावात्सनिर्वेदैर्मनोभिरुपलक्षिताः । किं च । प्रणयविहत्या प्रार्थनाभङ्गेन ध्वस्तरुचयो नष्टकान्तयः सगन्धर्वा गन्धर्वसहितास्त्रिदशवनिताः स्वं धाम स्वस्थानं प्रतिययुः । शिखरिणीवृत्तमेतत्-
रसै रुद्रैश्छिन्ना यमनसभला गः शिखरिणी इति लक्षणात्
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दु | रा | स | द | व | न | ज्या | या |
| न्ग | म्य | स्तु | ङ्गो | ऽपि | भू | ध | रः |
| न | ज | हा | ति | म | हौ | ज | स्कं |
| मा | न | प्रां | शु | म | ल | ङ्घ्य | ता |
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