सारांश
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लक्ष्मी, स्थिर यश और पुरुषत्व तभी तक बने रहते हैं जब तक व्यक्ति स्वाभिमान से विचलित नहीं होता।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तावदिति ॥ किं च । तावदेवासौ लक्ष्म्याश्रीयते। तावदस्य पुंसो यशः स्थिरम् । तावदेवासौ पुरुषः। पुरुषत्वेन गण्यत इत्यर्थः। यावन्मानादभिमानान्न हीयते न भ्रंश्यति। मानहीनस्य न किंचिच्छुभमस्तीत्यर्थः ॥
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | व | दा | श्री | य | ते | ल | क्ष्म्या |
| ता | व | द | स्य | स्थि | रं | य | शः |
| पु | रु | ष | स्ता | व | दे | वा | सौ |
| या | व | न्मा | ना | न्न | ही | य | ते |
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