अन्वयः
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(तेन) धार्तराष्ट्रैः सह प्रीतिः असूयत, अस्मासु वैरम् (असूयत)। हि सेविता असन्मैत्री कूलच्छाया इव दोषाय (भवति)।
English Summary
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'He (Yudhishthira) cultivated friendship with the sons of Dhritarashtra and enmity towards us. Indeed, friendship with the wicked, when resorted to, leads only to harm, just like taking shelter in the shade of a collapsing riverbank.'
सारांश
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धृतराष्ट्र के पुत्रों की हमारे प्रति मैत्री वैर में बदल गई; दुष्टों से मित्रता नदी के तट की अस्थिर छाया की भाँति केवल दोष और विनाश का कारण होती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
धार्तराष्ट्रेरिति ॥ धार्तराष्ट्रैर्धृतराष्ट्रपुत्रैः सह प्रीतिः सौहार्दमेवास्मासु विषये वैरमसूयत सूतवती । सूयतेर्दैवादिकात्कर्तरि लङ् । ननु सौहार्दं वैरजनकं चेद्विप्रतिषिद्धं तत्राहअसदिति । हि यस्मादसन्मैत्री दुर्जनेन संगतिः कूलस्यासन्नपातस्य नदीतटस्य छायेव सेविता श्रिता सती दोषायानर्थाय भवति । न खलु दुर्जनः सुजनवन्मित्रद्रोहपातकं पश्यतीति भावः । उपमाप्राणितोऽयमर्थान्तरन्यासालंकारः ॥ . नन्वादावेव तेषां वृत्तमविज्ञाय कथं मैत्री कृतेत्याशङ्क्य किं कुर्मः। दुर्जनवृत्तं दुर्विज्ञेयमित्याह
पदच्छेदः
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| धार्तराष्ट्रैः | धार्तराष्ट्र (३.३) | with the sons of Dhritarashtra |
| सह | सह | with |
| प्रीतिः | प्रीति (१.१) | friendship |
| वैरम् | वैर (१.१) | enmity |
| अस्मासु | अस्मद् (७.३) | towards us |
| असूयत | असूयत (√असूय् भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was cultivated |
| असन्मैत्री | असत्–मैत्री (१.१) | friendship with the wicked |
| हि | हि | for |
| दोषाय | दोष (४.१) | for harm |
| कूलच्छायेव | कूलछाया–इव | like the shade of a riverbank |
| सेविता | सेवित (√सेव्+क्त, १.१) | when resorted to |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धा | र्त | रा | ष्ट्रैः | स | ह | प्री | ति |
| र्वै | र | म | स्मा | स्व | सू | य | त |
| अ | स | न्मै | त्री | हि | दो | षा | य |
| कू | ल | च्छा | ये | व | से | वि | ता |
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