अन्वयः
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सभ्याः दुःशासनपुरःसराम्, अभिसायम् अर्कम् आवृत्ताम् महातरोः छायाम् इव, ताम् क्षणम् ऐक्षन्त।
English Summary
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'For a moment, the members of the assembly watched her, led by Duhshasana, appearing like the long shadow of a great tree that stretches towards the sun in the evening.'
सारांश
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सभासदों ने दुशासन द्वारा घसीटी जाती द्रौपदी को वैसे ही देखा जैसे संध्या के समय सूर्य की ओर लौटती हुई किसी विशाल वृक्ष की छाया को देखा जाता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तामिति ॥ दुःशासनः पुरःसरो यस्यास्तां तथोक्ताम् । दुःशासनेन सभां प्रत्याकृष्यमाणामित्यर्थः ।
अनुपसर्जनात् (अष्टाध्यायी ४.१.१४ ) इति न ङीप् । तां कृष्णाम् । सभायांसाधवः सभ्या:। सभाया यः (अष्टाध्यायी ४.४.१०५ ) इति यप्रत्ययः । अभिसायार्कं दिनान्तसूर्याभिमुखम् । स्थितस्येति शेषः । सायो नाशदिनान्तयोः इति विश्वः । लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये (अष्टाध्यायी २.१.१४ ) इत्यव्ययीभावः। महातरो: संबन्धिनीमावृत्तां छायामिव तां कृष्णां क्षणमैक्षन्त । न चिरं जुगुप्सितत्वात् । नापि किंचिद्वयाप्रियन्त माध्यस्थभङ्गभयात् । ते त्वर्कवदेव साक्षित्वमात्रमास्थिता इत्यर्थः । अत्राकृष्यमाणायाः कृष्णाया आक्रष्टारं प्रति पराङ्मुखत्वादावृत्तच्छायौपम्यम् । तथापि तां न मुञ्चतीति दुःशासनस्य तरुसाम्यम् ॥ अथास्यास्तादात्मिकमायथार्थ्यं वर्णयति
पदच्छेदः
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| ताम् | तद् (२.१) | her |
| ऐक्षन्त | ऐक्षन्त (√ईक्ष् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | watched |
| क्षणम् | क्षण (२.१) | for a moment |
| सभ्याः | सभ्य (१.३) | the assembly-men |
| दुःशासनपुरःसराम् | दुःशासन–पुरःसर (२.१) | led by Duhshasana |
| अभिसायम् | अभिसायम् | towards evening |
| अर्कम् | अर्क (२.१) | the sun |
| आवृत्ताम् | आवृत्त (आ√वृत्+क्त, २.१) | stretching towards |
| छायाम् | छाया (२.१) | the shadow |
| इव | इव | like |
| महातरोः | महातरु (६.१) | of a great tree |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | मै | क्ष | न्त | क्ष | णं | स | भ्या |
| दुः | शा | स | न | पु | रः | स | राम् |
| अ | भि | सा | या | र्क | मा | वृ | त्तां |
| छा | या | मि | व | म | हा | त | रोः |
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