अन्वयः
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कृष्णद्वैपायनादेशात् ईदृशम् व्रतम् बिभर्मि। सु-आराध्यस्य मरुत्वतः आराधने भृशम् यत्तः (अस्मि)।
English Summary
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'By the command of Krishna Dvaipayana (Vyasa), I am undertaking this vow. I am intensely engaged in the worship of Indra, who is most worthy of adoration.'
सारांश
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महर्षि व्यास के आदेश से मैं इस कठिन व्रत को धारण कर रहा हूँ और अपने आराध्य देव इंद्र को प्रसन्न करने के लिए पूर्णतः प्रयत्नशील हूँ।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
कृष्णेति ॥ द्वीपोऽयनं जन्मभूमिर्यस्य स द्वीपायनः । स एव द्वैपायनोव्यासः। प्रज्ञादित्वात्स्वार्थेऽण्प्रत्ययः । स एव कृष्णवर्णत्वात्कृष्णद्वैपायनश्च । तस्यादेशानुपदेशादी दृशम् । विरुद्धवेषमित्यर्थः। व्रतं तपोर्नियमं बिभर्मि धारयामि। न तु स्वेच्छयेति भावः। अथोपास्यां देवतामाह-भृशमिति । स्वाराध्यस्य सुखमाराध्यस्य । प्रादिसमासः
स्वाराधस्य इति पाठ उपसृष्टात्खल्प्रत्ययः । मरुत्वत, इन्द्रस्य । भृशं सम्यगाराधने यत्तः। प्रयत्नवानित्यर्थः । तस्य क्षत्रियदैवतत्वादिति भावः॥ ननु भवादृशभ्रातृसहायस्य महावीरस्य युधिष्ठिरस्य कथमरिपरिभवप्राप्तिरित्यत्त आह
पदच्छेदः
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| कृष्णद्वैपायनादेशात् | कृष्णद्वैपायन–आदेश (५.१) | by the command of Krishna Dvaipayana (Vyasa) |
| बिभर्मि | बिभर्मि (√भृ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I bear |
| व्रतम् | व्रत (२.१) | this vow |
| ईदृशम् | ईदृश (२.१) | such |
| भृशम् | भृशम् | intensely |
| आराधने | आराधन (७.१) | in the worship |
| यत्तः | यत्त (√यत्+क्त, १.१) | engaged |
| स्वाराध्यस्य | सु–आराध्य (६.१) | of the one worthy of worship |
| मरुत्वतः | मरुत्वत् (६.१) | of Indra |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | ष्ण | द्वै | पा | य | ना | दे | शा |
| द्बि | भ | र्मि | व्र | त | मी | दृ | शम् |
| भृ | श | मा | रा | ध | ने | य | त्तः |
| स्वा | रा | ध्य | स्य | म | रु | त्व | तः |
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