अन्वयः
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(तत् वचः) न्यायनिर्णीतसारत्वात् आगमे निरपेक्षम् इव (आसीत्), अन्येषाम् अप्रकम्प्यतया आम्नायवचनोपमम् (आसीत्)।
English Summary
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Because its essence was established by logic, it seemed independent of scriptural authority; yet, due to its unshakeable and authoritative nature for others, it was comparable to a pronouncement from the Vedas.
सारांश
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न्यायपूर्ण और सारगर्भित होने के कारण उनके वचन अन्य प्रमाणों की अपेक्षा नहीं रखते थे और अटल होने के कारण वे वेदों की वाणी के समान थे।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
न्यायेति ॥ पुनर्न्यायेन युक्त्या निर्णीतसारत्वान्निश्चितार्थत्वाद्धेतोरागमे शास्त्रे विषये निरपेक्षं स्वतन्त्रमिव । युक्तिदार्ढ्यादेवं प्रतीयते । वस्तुतस्तु शास्त्रसिद्धार्थमिवेतीवशब्दार्थः । किं च । अन्येषां प्रतिवादिनामप्रकम्प्यतयानुमानादिभिरबाध्यत्वादप्रत्याख्येयतयाम्नायवचनोपमम् । वेदवाक्यतुल्यमित्यर्थः ॥
पदच्छेदः
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| न्यायनिर्णीतसारत्वात् | न्याय–निर्णीत–सारत्व (५.१) | because its essence was established by logic |
| निरपेक्षम् | निरपेक्ष (२.१) | independent |
| इव | इव | as if |
| आगमे | आगम (७.१) | of scriptural authority |
| अप्रकम्प्यतया | अप्रकम्प्यता (३.१) | due to its unshakeability |
| अन्येषां | अन्य (६.३) | for others |
| आम्नायवचनोपमम् | आम्नाय–वचन–उपम (२.१) | comparable to a Vedic pronouncement |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न्या | य | नि | र्णी | त | सा | र | त्वा |
| न्नि | र | पे | क्ष | मि | वा | ग | मे |
| अ | प्र | क | म्प्य | त | या | न्ये | षा |
| मा | म्ना | य | व | च | नो | प | मम् |
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