अन्वयः
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अधुनातनी सुखसंवित्तिः श्वः त्वया स्मरणीया भविष्यति । इति कामान् स्वप्नोपमान् मत्वा तदङ्गतां मा गाः ।
English Summary
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Tomorrow, today's experience of pleasure will only be a memory. Considering desires to be like a dream, do not become subservient to them.
सारांश
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आज का सुख कल केवल स्मृति मात्र बनकर रह जाएगा; इन क्षणभंगुर भोगों को स्वप्न के समान जानकर इनमें आसक्त न हों।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
श्व इति ॥ अधुना भवा अधुनातनीदानींतनी। सायंचिरं-' इत्यादिना ट्युप्रत्ययः । सुखसंवित्तिः सुखानुभुवः श्वः परेऽहनि त्वया स्मरणीया । न त्वनुभवनीया । इति हेतोः । कम्यन्त इति कामा विषयास्तान्स्वप्नोपमान्स्वप्नतुल्यान्मत्वातात्त्विकान्निश्चित्य तदङ्गतां तच्छेषत्वं कामपरतन्त्रतां मा गा न गच्छ ।
इणो गा लुङि (अष्टाध्यायी २.४.४५ ) इति गादेशः ॥ इतोऽपि हेयाः कामा इत्याह
पदच्छेदः
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| श्वः | श्वस् | tomorrow |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| सुखसंवित्तिः | सुख–संवित्ति (१.१) | the experience of pleasure |
| स्मरणीया | स्मरणीय (√स्मृ+अनीयर्, १.१) | to be remembered |
| अधुनातनी | अधुनातन (१.१) | of today |
| इति | इति | thus |
| स्वप्नोपमान् | स्वप्न–उपम (२.३) | comparable to a dream |
| मत्वा | मत्वा (√मन्+क्त्वा) | having considered |
| कामान् | काम (२.३) | desires |
| मा | मा | do not |
| गाः | मा गाः (√गा कर्तरि लुङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | go |
| तदङ्गताम् | तद्–अङ्गता (२.१) | subservience to them |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्व | स्त्व | या | सु | ख | सं | वि | त्तिः |
| स्म | र | णी | या | धु | ना | त | नी |
| इ | ति | स्व | प्नो | प | मा | न्म | त्वा |
| का | मा | न्मा | गा | स्त | द | ङ्ग | ताम् |
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