अन्वयः
AI
युक्तः सन् प्रमाद्यसि, हितात् अपेतः सन् परितप्यसे । यदि आत्मनः पीडा न इष्टा, तर्हि भवता जने मा सञ्जि ।
English Summary
AI
When united with people, you become heedless of what is beneficial; when separated, you are tormented. If you do not desire your own pain, then do not get attached to people.
सारांश
AI
तुम हितकारी मार्ग को छोड़कर प्रमाद कर रहे हो और बाद में संताप करोगे; यदि स्वयं को पीड़ा नहीं देना चाहते, तो सांसारिक मोह-माया में आसक्त मत हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
युक्त इति ॥ किं च।युक्तः। हितेनेति शेषः। हितेनेष्टेन युक्तः सन्।प्रमाद्यसि प्रकर्षेण माद्यसि हृष्यसि । हितादपेतः परितप्यसे परितप्तो भवसि । तपेर्दैवादिकात्कर्तरि लट् । सत्यमेवं ततः किमत आह~~यदीति । पीडात्मनः स्वस्य च नष्टा यदि तर्हि भवता जने परस्मिन्नपि मा सञ्जि न सञ्ज्यताम् । सञ्जतेर्ण्यन्तात्कर्मणि लुङ् । आत्मदृष्टान्तेन परपीडातो निवर्तितव्यमित्यर्थः । पीडायाः परात्मनोः समत्वात् ॥ अथ देहास्थैर्यश्रद्धया च परपीडा न कार्येत्याह
पदच्छेदः
AI
| युक्तः | युक्त (√युज्+क्त, १.१) | when united |
| प्रमाद्यसि | प्रमाद्यसि (प्र√मद् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you become heedless |
| हितात् | हित (५.१) | from what is beneficial |
| अपेतः | अपेत (अप√इ+क्त, १.१) | when separated |
| परितप्यसे | परितप्यसे (परि√तप् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you are tormented |
| यदि | यदि | if |
| न | न | not |
| इष्टा | इष्ट (√इष्+क्त, १.१) | is desired |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | your own |
| पीडा | पीडा (१.१) | pain |
| मा | मा | do not |
| सञ्जि | मा सञ्जि (√सञ्ज् कर्तरि लुङ् (आत्मने.) म.पु. एक.) | get attached |
| भवता | भवत् (३.१) | by you |
| जने | जन (७.१) | to people |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यु | क्तः | प्र | मा | द्य | सि | हि | ता |
| द | पे | तः | प | रि | त | प्य | से |
| य | दि | ने | ष्टा | त्म | नः | पी | डा |
| मा | स | ञ्जि | भ | व | ता | ज | ने |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.