अन्वयः
AI
यः मनः विधुरं कर्ता, सः एव जनः अन्यदेहेषु कृतवान् इव भवति । अप्रियैः संयोगः इव प्रियैः सह विप्रयोगः च दुःखदः ।
English Summary
AI
One who makes the mind distressed is like one who has acted in other bodies, causing their suffering. Union with the unpleasant and separation from the dear are alike in causing distress.
सारांश
AI
लक्ष्मी दूसरों के शरीर में रहने पर भी देखने वाले के मन को व्यथित करती है; यह स्थिति प्रियजनों के वियोग और अप्रियजनों के संयोग के समान ही कष्टकारी है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
कृतवानिति ॥ तत्रात्मदृष्टान्तेनैव परपीडातो निवर्तितव्यमित्याशयेनाह-अप्रियैरनिष्टवस्तुभिः संयोग इव प्रियैरिष्टवस्तुभिः सह विप्रयोगो विरहोऽन्यदेहेषु स्वस्यैव देहान्तरेषु । अतीतानागतेष्विति शेषः । मनो विधुरं दुःखितं कृतवान् । कर्ता करिष्यति च । भविष्ये लुट् । तद्वर्तमाने चानुभूयत इति शेषः । इष्टनाशो दुःखहेतुरिति सर्वत्रापि त्रैकालिकसिद्धमिति श्लोकार्थः ॥ संप्रतीष्टसमागमस्य सुखहेतुत्वमाह
पदच्छेदः
AI
| कृतवान् | कृतवत् (√कृ+क्तवतु, १.१) | one who has acted |
| अन्यदेहेषु | अन्यदेह (७.३) | in other bodies |
| कर्ता | कर्तृ (√कृ+तृच्, १.१) | is the doer |
| च | च | and |
| विधुरम् | विधुर (२.१) | distressed |
| मनः | मनस् (२.१) | the mind |
| अप्रियैः | अप्रिय (३.३) | with the unpleasant |
| इव | इव | like |
| संयोगः | संयोग (सम्√युज्+घञ्, १.१) | union |
| विप्रयोगः | विप्रयोग (वि+प्र√युज्+घञ्, १.१) | separation |
| प्रियैः | प्रिय (३.३) | from the dear ones |
| सह | सह | with |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | त | वा | न | न्य | दे | हे | षु |
| क | र्ता | च | वि | धु | रं | म | नः |
| अ | प्रि | यै | रि | व | सं | यो | गो |
| वि | प्र | यो | गः | प्रि | यैः | स | ह |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.