जहिहि कठिनतां प्रयच्छ वाचं
ननु करुणामृदु मानसं मुनीनाम् ।
उपगतमवधीरयन्त्यभव्याः
स निपुणमेत्य कयाचिदेवमूचे ॥
जहिहि कठिनतां प्रयच्छ वाचं
ननु करुणामृदु मानसं मुनीनाम् ।
उपगतमवधीरयन्त्यभव्याः
स निपुणमेत्य कयाचिदेवमूचे ॥
ननु करुणामृदु मानसं मुनीनाम् ।
उपगतमवधीरयन्त्यभव्याः
स निपुणमेत्य कयाचिदेवमूचे ॥
अन्वयः
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(हे मुने) कठिनतां जहिहि, वाचं प्रयच्छ । ननु मुनीनां मानसं करुणा-मृदु (भवति) । अभव्याः उपगतम् अवधीरयन्ति । सः कयाचित् निपुणम् एत्य एवम् ऊचे ।
English Summary
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"Abandon your hardness, speak. Surely, the minds of sages are soft with compassion. It is the unfortunate who disregard one who has approached." Having skillfully approached, he (Arjuna) was thus addressed by a certain woman.
सारांश
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कठोरता त्यागकर कुछ कहिए, मुनियों का हृदय तो दयालु होता है। इस प्रकार एक चतुर स्त्री ने अर्जुन के निकट जाकर प्रार्थना की।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
जहिहीति ॥ कठिनतां निःस्पृहतां जहिहि । त्यजेत्यर्थः । जहातेः
आ च हौ (अष्टाध्यायी ६.४.११७ ) इतीकारः । वाचं प्रयच्छ । संधत्स्वेत्यर्थः । मुनीनां मानसं मनः करुणामृदु ननु दयार्द्रं खलु। स्वान्तं हृन्मानसं मनः इत्यमरः (अमरकोशः १.४.३३ ) । किं च। अभव्या निर्भाग्या उपगतं प्राप्तम् । विषयमिति शेषः । अवधीरयन्त्यवमन्यन्ते । एवमुक्तप्रकारेण सोऽर्जुनः कयाचिदेत्य समीपमागत्य निपुणं चतुरं यथा स्यात्तथोच उक्तः । अत्र पञ्चश्लोक्यां विप्रलम्भशृङ्गारस्यौत्सुक्यनाम्नो व्यभिचारिभावस्य चापुनरुक्तिः । अनौचित्येन नायिकायाः प्रवृत्तेराभासत्वमनुसंधेयम्। तदुक्तम्-'एकत्र चेन्नानुरागस्तिर्यङ्म्लेच्छगतोऽपि वा। योषितां बहुसक्तिश्चेद्रसाभासस्त्रिधा मतः ॥ इति । तन्निबन्धनादूर्जस्वलमलंकारः । तथा च सूत्रम्, 'रसभेदतदाभासतत्प्रशमानां निबन्धनेन रसवत्प्रायमूर्जस्वलम्' इति । समाहितातिरसबन्धे रसवदलंकारः। भावनिबन्धे प्रेयोऽलंकारः। रसभावनिबन्धे तूर्जस्वलालंकारः । तत्प्रशमनिबन्धने समाहितालंकार इति सूत्रार्थः ॥
पदच्छेदः
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| जहिहि | जहिहि (√हा कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | abandon |
| कठिनताम् | कठिनता (२.१) | hardness |
| प्रयच्छ | प्रयच्छ (प्र√दा कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | give |
| वाचम् | वाच् (२.१) | speech |
| ननु | ननु | surely |
| करुणामृदु | करुणा–मृदु (१.१) | soft with compassion |
| मानसम् | मानस (१.१) | the mind |
| मुनीनाम् | मुनि (६.३) | of sages |
| उपगतम् | उपगत (उप√गम्+क्त, २.१) | one who has approached |
| अवधीरयन्ति | अवधीरयन्ति (अव√धीर् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they disregard |
| अभव्याः | अभव्य (१.३) | the unfortunate |
| सः | तद् (१.१) | he |
| निपुणम् | निपुणम् | skillfully |
| एत्य | एत्य (आ√इ+ल्यप्) | having approached |
| कयाचित् | किञ्चित् (३.१) | by a certain woman |
| एवम् | एवम् | thus |
| ऊचे | ऊचे (√वच् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was spoken to |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | हि | हि | क | ठि | न | तां | प्र | य | च्छ | वा | चं | |
| न | नु | क | रु | णा | मृ | दु | मा | न | सं | मु | नी | नाम् |
| उ | प | ग | त | म | व | धी | र | य | न्त्य | भ | व्याः | |
| स | नि | पु | ण | मे | त्य | क | या | चि | दे | व | मू | चे |
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