अभूत् कोऽपि प्रेमा मयि मुररिपोर्यः सखि पुरा
परां कर्मापेक्षामपि तदवलम्बान् न गणयेत् ।
तथेदानीं हा धिक् समजनि तटस्थः स्फुटमहं
भजे लज्जां येन क्षणमपि पुनर्जीवितुमपि ॥
अभूत् कोऽपि प्रेमा मयि मुररिपोर्यः सखि पुरा
परां कर्मापेक्षामपि तदवलम्बान् न गणयेत् ।
तथेदानीं हा धिक् समजनि तटस्थः स्फुटमहं
भजे लज्जां येन क्षणमपि पुनर्जीवितुमपि ॥
परां कर्मापेक्षामपि तदवलम्बान् न गणयेत् ।
तथेदानीं हा धिक् समजनि तटस्थः स्फुटमहं
भजे लज्जां येन क्षणमपि पुनर्जीवितुमपि ॥
अन्वयः
AI
हे सखि, पुरा मयि मुरा-रिपोः कः अपि सः प्रेमा अभूत्, यः तद्-अवलम्बात् पराम् कर्म-अपेक्षाम् अपि न गणयेत्। हा धिक्, इदानीम् अहम् स्फुटम् तटस्थः समजनि, येन क्षणम् अपि पुनः जीवितुम् अपि लज्जाम् भजे॥
Summary
AI
O friend, formerly there was such a love for me in the enemy of Mura that he would not consider any other obligation. Alas! Now I have clearly become a stranger to him, because of which I feel ashamed even to remain alive for a single moment.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भू | त्को | ऽपि | प्रे | मा | म | यि | मु | र | रि | पो | र्यः | स | खि | पु | रा |
| प | रां | क | र्मा | पे | क्षा | म | पि | त | द | व | ल | म्बा | न्न | ग | ण | येत् |
| त | थे | दा | नीं | हा | धि | क्स | म | ज | नि | त | ट | स्थः | स्फु | ट | म | हं |
| भ | जे | ल | ज्जां | ये | न | क्ष | ण | म | पि | पु | न | र्जी | वि | तु | म | पि |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.