मुकुन्द भ्रान्ताक्षी किमपि यदसंकल्पितशतं
विधत्ते तद्वक्तुं जगति मनुजः कः प्रभवति ।
कदाचित् कल्याणी विलपति य उत्कण्ठितमति-
स्तदाख्यामि स्वामिन् गमय मकरोत्तंसपदवीम् ॥
मुकुन्द भ्रान्ताक्षी किमपि यदसंकल्पितशतं
विधत्ते तद्वक्तुं जगति मनुजः कः प्रभवति ।
कदाचित् कल्याणी विलपति य उत्कण्ठितमति-
स्तदाख्यामि स्वामिन् गमय मकरोत्तंसपदवीम् ॥
विधत्ते तद्वक्तुं जगति मनुजः कः प्रभवति ।
कदाचित् कल्याणी विलपति य उत्कण्ठितमति-
स्तदाख्यामि स्वामिन् गमय मकरोत्तंसपदवीम् ॥
अन्वयः
AI
हे मुकुन्द, भ्रान्त-अक्षी यत् किम् अपि असङ्कल्पित-शतम् विधत्ते, तत् वक्तुम् जगति कः मनुजः प्रभवति? कदाचित् कल्याणी यत् उत्कण्ठित-मतिः विलपति, हे स्वामिन्, तत् आख्यामि, मकर-उत्तंस-पदवीम् गमय॥
Summary
AI
O Mukunda, what man in this world is capable of describing the hundreds of unintended things she does with her wandering eyes? O Lord, I shall relate what the auspicious one laments when her mind is filled with longing; please incline your crocodile-shaped earrings to listen.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | कु | न्द | भ्रा | न्ता | क्षी | कि | म | पि | य | द | सं | क | ल्पि | त | श | तं |
| वि | ध | त्ते | त | द्व | क्तुं | ज | ग | ति | म | नु | जः | कः | प्र | भ | व | ति |
| क | दा | चि | त्क | ल्या | णी | वि | ल | प | ति | य | उ | त्क | ण्ठि | त | म | ति |
| स्त | दा | ख्या | मि | स्वा | मि | न्ग | म | य | म | क | रो | त्तं | स | प | द | वीम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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