विपत्तिभ्यः प्राणान् कथमपि भवत्सङ्गमसुख-
स्पृहाधीना शौरे मम सहचरी रक्षितवती ।
अतिक्रान्ते सम्प्रत्य् अवधिदिवसे जीवनविधौ
हताशा निःशङ्कं वितरति दृशौ चुतमुकुले ॥
विपत्तिभ्यः प्राणान् कथमपि भवत्सङ्गमसुख-
स्पृहाधीना शौरे मम सहचरी रक्षितवती ।
अतिक्रान्ते सम्प्रत्य् अवधिदिवसे जीवनविधौ
हताशा निःशङ्कं वितरति दृशौ चुतमुकुले ॥
स्पृहाधीना शौरे मम सहचरी रक्षितवती ।
अतिक्रान्ते सम्प्रत्य् अवधिदिवसे जीवनविधौ
हताशा निःशङ्कं वितरति दृशौ चुतमुकुले ॥
अन्वयः
AI
हे शौरे, भवत्-सङ्गम-सुख-स्पृहा-अधीना मम सहचरी विपत्तिभ्यः प्राणान् कथम् अपि रक्षितवती। सम्प्रति जीवन-विधौ अवधि-दिवसे अतिक्रान्ते सति हताशा सा चूत-मुकुले निःशङ्कम् दृशौ वितरति॥
Summary
AI
O Śauri, my friend somehow preserved her life from calamities, being dependent on the desire for union with you. Now that the appointed day for living has passed, she, having lost hope, fearlessly casts her eyes upon the mango blossoms, accepting death.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | प | त्ति | भ्यः | प्रा | णा | न्क | थ | म | पि | भ | व | त्स | ङ्ग | म | सु | ख |
| स्पृ | हा | धी | ना | शौ | रे | म | म | स | ह | च | री | र | क्षि | त | व | ती |
| अ | ति | क्रा | न्ते | स | म्प्र | त्य | व | धि | दि | व | से | जी | व | न | वि | धौ |
| ह | ता | शा | निः | श | ङ्कं | वि | त | र | ति | दृ | शौ | चु | त | मु | कु | ले |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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