विशीर्णाङ्गीमन्तर्व्रणविलुठनादुत्कलिकया
परीतां भूयस्या सततमुपरागव्यतिकराम् ।
परिध्वस्तामोदां विरमितसमस्तालिकुतुकां
विधो पादस्पर्शादपि सुखय राधाकुमुदिनीम् ॥
विशीर्णाङ्गीमन्तर्व्रणविलुठनादुत्कलिकया
परीतां भूयस्या सततमुपरागव्यतिकराम् ।
परिध्वस्तामोदां विरमितसमस्तालिकुतुकां
विधो पादस्पर्शादपि सुखय राधाकुमुदिनीम् ॥
परीतां भूयस्या सततमुपरागव्यतिकराम् ।
परिध्वस्तामोदां विरमितसमस्तालिकुतुकां
विधो पादस्पर्शादपि सुखय राधाकुमुदिनीम् ॥
अन्वयः
AI
हे विधो, अन्त:-व्रण-विलुठनात् विशीर्ण-अङ्गीम्, उत्कलिकया परीताम्, भूयस्या सततम् उपराग-व्यतिकराम्, परिध्वस्त-आमोदाम्, विरमित-समस्त-अलि-कुतुकाम् राधा-कुमुदिनीम् पाद-स्पर्शात् अपि सुखय॥
Summary
AI
O Moon-like Lord, please delight the lily-like Rādhā with the touch of your feet. Her limbs are shattered by internal wounds, she is overcome by longing, constantly eclipsed by distress, her fragrance is destroyed, and all the joy of her senses has ceased.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | शी | र्णा | ङ्गी | म | न्त | र्व्र | ण | वि | लु | ठ | ना | दु | त्क | लि | क | या |
| प | री | तां | भू | य | स्या | स | त | त | मु | प | रा | ग | व्य | ति | क | राम् |
| प | रि | ध्व | स्ता | मो | दां | वि | र | मि | त | स | म | स्ता | लि | कु | तु | कां |
| वि | धो | पा | द | स्प | र्शा | द | पि | सु | ख | य | रा | धा | कु | मु | दि | नीम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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