पयोराशिस्फीतत्विषि हिमकरोत्तंसमधुरे
दधाने दृग्भङ्ग्या स्मरविजयिरूपं मम सखी ।
हरे दत्तस्वान्ता भवति तदिमां किं प्रभवति
स्मरो हन्तुं किन्तु व्यथयति भवान् एव कुतुकी ॥
पयोराशिस्फीतत्विषि हिमकरोत्तंसमधुरे
दधाने दृग्भङ्ग्या स्मरविजयिरूपं मम सखी ।
हरे दत्तस्वान्ता भवति तदिमां किं प्रभवति
स्मरो हन्तुं किन्तु व्यथयति भवान् एव कुतुकी ॥
दधाने दृग्भङ्ग्या स्मरविजयिरूपं मम सखी ।
हरे दत्तस्वान्ता भवति तदिमां किं प्रभवति
स्मरो हन्तुं किन्तु व्यथयति भवान् एव कुतुकी ॥
अन्वयः
AI
हे हरे, पयो-राशि-स्फीत-त्विषि, हिम-कर-उत्तंस-मधुरे, दृग्-भङ्ग्या स्मर-विजयि-रूपम् दधाने त्वयि मम सखी दत्त-स्वान्ता भवति। तत् इमाम् हन्तुम् स्मरः किम् प्रभवति? किन्तु कुतुक़ी भवान् एव व्यथयति॥
Summary
AI
O Hari, my friend has offered her heart to you, who possess a luster as vast as the ocean, who are charming with the moon as a crest-ornament, and who bear the form of the conqueror of Cupid with a mere glance. Therefore, how can Cupid kill her? Rather, it is only you, being playful, who cause her pain.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | यो | रा | शि | स्फी | त | त्वि | षि | हि | म | क | रो | त्तं | स | म | धु | रे |
| द | धा | ने | दृ | ग्भ | ङ्ग्या | स्म | र | वि | ज | यि | रू | पं | म | म | स | खी |
| ह | रे | द | त्त | स्वा | न्ता | भ | व | ति | त | दि | मां | किं | प्र | भ | व | ति |
| स्म | रो | ह | न्तुं | कि | न्तु | व्य | थ | य | ति | भ | वा | ने | व | कु | तु | की |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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