मुरारे कालिन्दीसलिलदलदिन्दीवररुचे
मुकुन्द श्रीवृन्दावनमदन वृन्दारकमणे ।
व्रजानन्दिन् नन्दीश्वरदयित नन्दात्मज हरे
सदेति क्रन्दन्ती परिजनशुचं कन्दलयति ॥
मुरारे कालिन्दीसलिलदलदिन्दीवररुचे
मुकुन्द श्रीवृन्दावनमदन वृन्दारकमणे ।
व्रजानन्दिन् नन्दीश्वरदयित नन्दात्मज हरे
सदेति क्रन्दन्ती परिजनशुचं कन्दलयति ॥
मुकुन्द श्रीवृन्दावनमदन वृन्दारकमणे ।
व्रजानन्दिन् नन्दीश्वरदयित नन्दात्मज हरे
सदेति क्रन्दन्ती परिजनशुचं कन्दलयति ॥
अन्वयः
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हे मुरा-अरे, कालिन्दी-सलिल-दलत्-इन्दीवर-रुचे, मुकुन्द, श्री-वृन्दावन-मदन, वृन्दारक-मणे, व्रज-आनन्दिन्, नन्दी-ईश्वर-दयित, नन्दा-आत्मज, हरे, इति सदा क्रन्दन्ती सा परिजन-शुचम् कन्दलयति॥
Summary
AI
Crying out, "O Murāri, you who have the luster of a blossoming blue lotus in the Yamunā! O Mukunda, the Cupid of Vṛndāvana, the jewel among gods! O delight of Vraja, dear one of Nandīśvara, son of Nanda, O Hari!" she causes the grief of her kinsfolk to sprout and grow.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | रा | रे | का | लि | न्दी | स | लि | ल | द | ल | दि | न्दी | व | र | रु | चे |
| मु | कु | न्द | श्री | वृ | न्दा | व | न | म | द | न | वृ | न्दा | र | क | म | णे |
| व्र | जा | न | न्दि | न्न | न्दी | श्व | र | द | यि | त | न | न्दा | त्म | ज | ह | रे |
| स | दे | ति | क्र | न्द | न्ती | प | रि | ज | न | शु | चं | क | न्द | ल | य | ति |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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