समक्षं सर्वेषां विहरसि मदाधिप्रणयिनाम्
इति श्रुत्वा नूनं गुरुतरसमाधिं कलयति ।
सदा कंसाराते भजसि यमिनां नेत्रपदवीम्
इति व्यक्तं सज्जीभवति यममालोचितुमपि ॥
समक्षं सर्वेषां विहरसि मदाधिप्रणयिनाम्
इति श्रुत्वा नूनं गुरुतरसमाधिं कलयति ।
सदा कंसाराते भजसि यमिनां नेत्रपदवीम्
इति व्यक्तं सज्जीभवति यममालोचितुमपि ॥
इति श्रुत्वा नूनं गुरुतरसमाधिं कलयति ।
सदा कंसाराते भजसि यमिनां नेत्रपदवीम्
इति व्यक्तं सज्जीभवति यममालोचितुमपि ॥
अन्वयः
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हे कंस-अराते, त्वम् मद-आधि-प्रणयिनाम् सर्वेषाम् समक्षम् विहरसि इति श्रुत्वा सा नूनम् गुरुतर-समाधिम् कलयति। सदा यमिनाम् नेत्र-पदवीम् भजसि इति व्यक्तम् यमम् आलोचितुम् अपि सज्जी-भवति॥
Summary
AI
O enemy of Kaṃsa, hearing that you sport before all those filled with great mental agony, she certainly takes to intense meditation. Since it is well-known that you always occupy the path of the eyes of self-controlled sages, she becomes ready even to face Yama, the god of death.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | म | क्षं | स | र्वे | षां | वि | ह | र | सि | म | दा | धि | प्र | ण | यि | ना |
| मि | ति | श्रु | त्वा | नू | नं | गु | रु | त | र | स | मा | धिं | क | ल | य | ति |
| स | दा | कं | सा | रा | ते | भ | ज | सि | य | मि | नां | ने | त्र | प | द | वी |
| मि | ति | व्य | क्तं | स | ज्जी | भ | व | ति | य | म | मा | लो | चि | तु | म | पि |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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