त्वया सन्तापानामुपरि परिमुक्तातिरभसा-
दिदानीमापेदे तदपि तव चेष्टां प्रियसखी ।
यदेषा कंसारे भिदुरहृदयं त्वामवयति
सतीनां मूर्धन्या भिदुरहृदयाभूदनुदिनम् ॥
त्वया सन्तापानामुपरि परिमुक्तातिरभसा-
दिदानीमापेदे तदपि तव चेष्टां प्रियसखी ।
यदेषा कंसारे भिदुरहृदयं त्वामवयति
सतीनां मूर्धन्या भिदुरहृदयाभूदनुदिनम् ॥
दिदानीमापेदे तदपि तव चेष्टां प्रियसखी ।
यदेषा कंसारे भिदुरहृदयं त्वामवयति
सतीनां मूर्धन्या भिदुरहृदयाभूदनुदिनम् ॥
अन्वयः
AI
हे कंस-अरे, इदानीम् सा प्रियसखी त्वया सन्तापानाम् उपरि अति-रभसात् परिमुक्ता तत अपि तव चेष्टाम् आपेदे। यत् सतीनाम् मूर्धन्या एषा भिदुर-हृदयम् त्वाम् अवयति, सा अनुदिनम् भिदुर-हृदया अभूत्॥
Summary
AI
O slayer of Kaṃsa, now your dear friend has acquired your very nature, even though she was cast away by you with great haste amidst her sufferings. Since she, the crest-jewel of chaste women, meditates upon you who are broken-hearted, she herself has become broken-hearted day by day.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | या | स | न्ता | पा | ना | मु | प | रि | प | रि | मु | क्ता | ति | र | भ | सा |
| दि | दा | नी | मा | पे | दे | त | द | पि | त | व | चे | ष्टां | प्रि | य | स | खी |
| य | दे | षा | कं | सा | रे | भि | दु | र | हृ | द | यं | त्वा | म | व | य | ति |
| स | ती | नां | मू | र्ध | न्या | भि | दु | र | हृ | द | या | भू | द | नु | दि | नम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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