कदाचिन् मूढेयं निविडभवदीयस्मृतिमदा-
दमन्दादात्मानं कलयति भवन्तं मम सखी ।
तथास्या राधाया विरहदहनाकल्पितधियो
मुरारे दुःसाध्या क्षणमपि न बाधा विरमति ॥
कदाचिन् मूढेयं निविडभवदीयस्मृतिमदा-
दमन्दादात्मानं कलयति भवन्तं मम सखी ।
तथास्या राधाया विरहदहनाकल्पितधियो
मुरारे दुःसाध्या क्षणमपि न बाधा विरमति ॥
दमन्दादात्मानं कलयति भवन्तं मम सखी ।
तथास्या राधाया विरहदहनाकल्पितधियो
मुरारे दुःसाध्या क्षणमपि न बाधा विरमति ॥
अन्वयः
AI
कदाचित् इयम् मूढा मम सखी अमन्दात् निविड-भवदीय-स्मृति-मदात् आत्मानम् भवन्तम् कलयति। मुरा-अरे, तथा अस्याः विरह-दहन-आकल्पित-धियः राधायाः दुःसाध्या बाधा क्षणम् अपि न विरमति॥
Summary
AI
At times, this deluded friend of mine, due to the intense intoxication of remembering you, perceives herself to be you. O Murāri, thus the unbearable torment of Rādhā, whose intellect is fashioned by the fire of separation, does not cease even for a moment.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | दा | चि | न्मू | ढे | यं | नि | वि | ड | भ | व | दी | य | स्मृ | ति | म | दा |
| द | म | न्दा | दा | त्मा | नं | क | ल | य | ति | भ | व | न्तं | म | म | स | खी |
| त | था | स्या | रा | धा | या | वि | र | ह | द | ह | ना | क | ल्पि | त | धि | यो |
| मु | रा | रे | दुः | सा | ध्या | क्ष | ण | म | पि | न | बा | धा | वि | र | म | ति |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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