भवन्तं सन्तप्ता विदलिततमालाङ्कुररसै-
र्विलिख्य भ्रूभङ्गीकृतमदनकोदण्डकदनम् ।
निधासयन्ती कण्ठे तव निजभुजावल्लरीमसौ
धरन्यामुन्मीलज्जाडिमनिविडाङ्गी विलुठति ॥
भवन्तं सन्तप्ता विदलिततमालाङ्कुररसै-
र्विलिख्य भ्रूभङ्गीकृतमदनकोदण्डकदनम् ।
निधासयन्ती कण्ठे तव निजभुजावल्लरीमसौ
धरन्यामुन्मीलज्जाडिमनिविडाङ्गी विलुठति ॥
र्विलिख्य भ्रूभङ्गीकृतमदनकोदण्डकदनम् ।
निधासयन्ती कण्ठे तव निजभुजावल्लरीमसौ
धरन्यामुन्मीलज्जाडिमनिविडाङ्गी विलुठति ॥
अन्वयः
AI
सन्तप्ता असौ विदलित-तमाल-अङ्कुर-रसैः भ्रू-भङ्गी-कृत-मदन-कोदण्ड-कदनम् भवन्तम् विलिख्य तव कण्ठे निज-भुजा-वल्लरीम् निधासयन्ती उन्मीलत्-जाडिम-निविड-अङ्गी धरण्याम् विलुठति॥
Summary
AI
Afflicted by pain, she draws your form—which destroys the bow of Madana with the arch of your eyebrows—using the juice of crushed tamāla sprouts. Wishing to place the vines of her arms around your neck, she rolls on the ground, her limbs stiffened by an emerging numbness.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ | व | न्तं | स | न्त | प्ता | वि | द | लि | त | त | मा | ला | ङ्कु | र | र | सै | |
| र्वि | लि | ख्य | भ्रू | भ | ङ्गी | कृ | त | म | द | न | को | द | ण्ड | क | द | नम् | |
| नि | धा | स | य | न्ती | क | ण्ठे | त | व | नि | ज | भु | जा | व | ल्ल | री | म | |
| सौ | ध | र | न्या | मु | न्मी | ल | ज्जा | डि | म | नि | वि | डा | ङ्गी | वि | लु | ठ | ति |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | |||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.