पशूनां पातारं भुजगरिपुपुत्रप्रणयिनं
स्मरोद्वर्धिक्रीडं निविडघनसारद्युतिहरम् ।
सदाभ्यर्णे नन्दीश्वरगिरिभुवो रङ्गरसिकं
भवन्तं कंसारे भजति भवदाप्त्यै मम सखी ॥
पशूनां पातारं भुजगरिपुपुत्रप्रणयिनं
स्मरोद्वर्धिक्रीडं निविडघनसारद्युतिहरम् ।
सदाभ्यर्णे नन्दीश्वरगिरिभुवो रङ्गरसिकं
भवन्तं कंसारे भजति भवदाप्त्यै मम सखी ॥
स्मरोद्वर्धिक्रीडं निविडघनसारद्युतिहरम् ।
सदाभ्यर्णे नन्दीश्वरगिरिभुवो रङ्गरसिकं
भवन्तं कंसारे भजति भवदाप्त्यै मम सखी ॥
अन्वयः
AI
हे कंस-अरे, मम सखी पशूनाम् पातारम्, भुजग-रिपु-पुत्र-प्रणयिनम्, स्मर-उद्वर्धि-क्रीडम्, निविड-घनसार-द्युति-हरम्, सदा नन्दी-ईश्वर-गिरि-भुवः अभ्यर्णे रङ्ग-रसिकम् भवन्तम् भवत्-आप्त्यै भजति॥
Summary
AI
O slayer of Kaṃsa, to attain you, my friend worships Bhava, who is the protector of beings, fond of Garuḍa's enemy's son, whose sports increase love, who robs the luster of dense camphor, and who delights in dancing near the Nandīśvara hill.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | शू | नां | पा | ता | रं | भु | ज | ग | रि | पु | पु | त्र | प्र | ण | यि | नं |
| स्म | रो | द्व | र्धि | क्री | डं | नि | वि | ड | घ | न | सा | र | द्यु | ति | ह | रम् |
| स | दा | भ्य | र्णे | न | न्दी | श्व | र | गि | रि | भु | वो | र | ङ्ग | र | सि | कं |
| भ | व | न्तं | कं | सा | रे | भ | ज | ति | भ | व | दा | प्त्यै | म | म | स | खी |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.