अमर्षात् प्रेमेर्ष्यां सपदि दधती कंसमथने
प्रवृत्ता हंसाय स्वमभिलषितं शंसितुमसौ ।
न तस्या दोषोऽयं यदिह विहगं प्रार्थितवती
न कस्मिन् विश्रम्भं दिशति हरिभक्तिप्रणयिता ॥
अमर्षात् प्रेमेर्ष्यां सपदि दधती कंसमथने
प्रवृत्ता हंसाय स्वमभिलषितं शंसितुमसौ ।
न तस्या दोषोऽयं यदिह विहगं प्रार्थितवती
न कस्मिन् विश्रम्भं दिशति हरिभक्तिप्रणयिता ॥
प्रवृत्ता हंसाय स्वमभिलषितं शंसितुमसौ ।
न तस्या दोषोऽयं यदिह विहगं प्रार्थितवती
न कस्मिन् विश्रम्भं दिशति हरिभक्तिप्रणयिता ॥
अन्वयः
AI
असौ सपदि कंस-मथने अमर्षात् प्रेम-ईर्ष्यां दधती हंसाय स्वम् अभिलषितं शंसितुं प्रवृत्ता। अयम् तस्याः दोषः न यद् इह विहगम् प्रार्थितवती, हरि-भक्ति-प्रणयिता कस्मिन् विश्रम्भं न दिशति?
Summary
AI
Driven by the indignant pride of love toward Kṛṣṇa, Lalitā began to express her desire to the swan. It was no fault of hers to petition a bird, for the intimacy of devotion to Hari inspires trust in all living beings, seeing no distinction between the sentient and the insentient.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | म | र्षा | त्प्रे | मे | र्ष्यां | स | प | दि | द | ध | ती | कं | स | म | थ | ने |
| प्र | वृ | त्ता | हं | सा | य | स्व | म | भि | ल | षि | तं | शं | सि | तु | म | सौ |
| न | त | स्या | दो | षो | ऽयं | य | दि | ह | वि | ह | गं | प्रा | र्थि | त | व | ती |
| न | क | स्मि | न्वि | श्र | म्भं | दि | श | ति | ह | रि | भ | क्ति | प्र | ण | यि | ता |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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