तदालोकस्तोकोच्छ्वसितहृदया सादरमसौ
प्रणामं शंसन्ती लघु लघु समासाद्य सविधम् ।
धृतोत्कण्ठा सद्यो हरिसदसि सन्देशहरणे
वरं दूतं मेने तमतिललितं हन्त ललिता ॥
तदालोकस्तोकोच्छ्वसितहृदया सादरमसौ
प्रणामं शंसन्ती लघु लघु समासाद्य सविधम् ।
धृतोत्कण्ठा सद्यो हरिसदसि सन्देशहरणे
वरं दूतं मेने तमतिललितं हन्त ललिता ॥
प्रणामं शंसन्ती लघु लघु समासाद्य सविधम् ।
धृतोत्कण्ठा सद्यो हरिसदसि सन्देशहरणे
वरं दूतं मेने तमतिललितं हन्त ललिता ॥
अन्वयः
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तदा तद्-आलोक-स्तोक-उच्छ्वसित-हृदया असौ सादरं प्रणामं शंसन्ती लघु लघु सविधं समासाद्य धृत-उत्कण्ठा सद्यः हरि-सदसि सन्देश-हरणे तम् अति-ललितं वरं दूतं मेने।
Summary
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Her heart slightly encouraged by the sight of the swan, Lalitā approached it gently. Offering her respectful obeisances and filled with sudden longing, she considered this charming bird to be the most excellent messenger for carrying a plea to the court of Hari.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | दा | लो | क | स्तो | को | च्छ्व | सि | त | हृ | द | या | सा | द | र | म | सौ |
| प्र | णा | मं | शं | स | न्ती | ल | घु | ल | घु | स | मा | सा | द्य | स | वि | धम् |
| धृ | तो | त्क | ण्ठा | स | द्यो | ह | रि | स | द | सि | स | न्दे | श | ह | र | णे |
| व | रं | दू | तं | मे | ने | त | म | ति | ल | लि | तं | ह | न्त | ल | लि | ता |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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