पवित्रेषु प्रायो विरचयसि तोयेषु वसतिं
प्रमोदं नालीके वहसि विशदात्मा स्वयमसि ।
ततोऽहं दुःखार्ता शरणमबला त्वां गतवती
न याच्ञा सत्पक्षे व्रजति हि कदाचिद्विफलताम् ॥
पवित्रेषु प्रायो विरचयसि तोयेषु वसतिं
प्रमोदं नालीके वहसि विशदात्मा स्वयमसि ।
ततोऽहं दुःखार्ता शरणमबला त्वां गतवती
न याच्ञा सत्पक्षे व्रजति हि कदाचिद्विफलताम् ॥
प्रमोदं नालीके वहसि विशदात्मा स्वयमसि ।
ततोऽहं दुःखार्ता शरणमबला त्वां गतवती
न याच्ञा सत्पक्षे व्रजति हि कदाचिद्विफलताम् ॥
अन्वयः
AI
विशद-आत्मा! भवान् प्रायः पवित्रेषु तोयेषु वसतिं विरचयसि, नालीके प्रमोदं वहसि, स्वयम् असि। ततः दुःख-आर्ता अबला अहम् त्वां शरणं गतवती, सत्-पक्षे याच्ञा हि कदाचित् विफलतां न व्रजति।
Summary
AI
O pure-souled one! You dwell in sacred waters and find joy in the lotus. Therefore, I, a distressed and helpless woman, have sought refuge in you. A request made to one who is virtuous and possesses 'good wings' (or sides) never goes in vain.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | वि | त्रे | षु | प्रा | यो | वि | र | च | य | सि | तो | ये | षु | व | स | तिं |
| प्र | मो | दं | ना | ली | के | व | ह | सि | वि | श | दा | त्मा | स्व | य | म | सि |
| त | तो | ऽहं | दुः | खा | र्ता | श | र | ण | म | ब | ला | त्वां | ग | त | व | ती |
| न | या | च्ञा | स | त्प | क्षे | व्र | ज | ति | हि | क | दा | चि | द्वि | फ | ल | ताम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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