त्रिवक्राहो धन्या हृदयमिव ते स्वं पुरमसौ
समासाद्य स्वैरं यदिह विलसन्ती निवसति ।
ध्रुवं पुण्यभ्रंशादजनि सरलेयं मम सखी
प्रवेशस्तत्राभूत् क्षणमपि यदस्या न सुलभः ॥
त्रिवक्राहो धन्या हृदयमिव ते स्वं पुरमसौ
समासाद्य स्वैरं यदिह विलसन्ती निवसति ।
ध्रुवं पुण्यभ्रंशादजनि सरलेयं मम सखी
प्रवेशस्तत्राभूत् क्षणमपि यदस्या न सुलभः ॥
समासाद्य स्वैरं यदिह विलसन्ती निवसति ।
ध्रुवं पुण्यभ्रंशादजनि सरलेयं मम सखी
प्रवेशस्तत्राभूत् क्षणमपि यदस्या न सुलभः ॥
अन्वयः
AI
अहो, त्रिवक्रा धन्या, असौ ते हृदयम् इव स्वं पुरं समासाद्य यत् इह स्वैरं विलसन्ती निवसति। ध्रुवं पुण्य-भ्रंशात् इयम् मम सरला सखी अजनि, यत् अस्याः तत्र क्षणम् अपि प्रवेशः न सुलभः अभूत्।
Summary
AI
Oh, how fortunate is *Trivakrā* (*Kubjā*)! She has reached Your city, which is like Your heart, and lives there sporting at will. Surely, my simple friend was born from a loss of merit, as she cannot find entrance there even for a moment.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्रि | व | क्रा | हो | ध | न्या | हृ | द | य | मि | व | ते | स्वं | पु | र | म | सौ |
| स | मा | सा | द्य | स्वै | रं | य | दि | ह | वि | ल | स | न्ती | नि | व | स | ति |
| ध्रु | वं | पु | ण्य | भ्रं | शा | द | ज | नि | स | र | ले | यं | म | म | स | खी |
| प्र | वे | श | स्त | त्रा | भू | त्क्ष | ण | म | पि | य | द | स्या | न | सु | ल | भः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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