मया वाच्यः किं वा त्वमिह निजदोषात् परमसौ
ययौ मन्दा वृन्दावनकुसुमबन्धो विधुरताम् ।
यदर्थं दुःखाग्निर्विकृशति तमद्यापि हृदयान्
न यस्माद्दुर्मेधा लवमपि भवन्तं दवयति ॥
मया वाच्यः किं वा त्वमिह निजदोषात् परमसौ
ययौ मन्दा वृन्दावनकुसुमबन्धो विधुरताम् ।
यदर्थं दुःखाग्निर्विकृशति तमद्यापि हृदयान्
न यस्माद्दुर्मेधा लवमपि भवन्तं दवयति ॥
ययौ मन्दा वृन्दावनकुसुमबन्धो विधुरताम् ।
यदर्थं दुःखाग्निर्विकृशति तमद्यापि हृदयान्
न यस्माद्दुर्मेधा लवमपि भवन्तं दवयति ॥
अन्वयः
AI
मया त्वम् किम् वा वाच्यः? इह असौ मन्दा निज-दोषात् परम् वृन्दावन-कुसुम-बन्धो विधुरताम् ययौ, यत्-अर्थं दुःख-अग्निः हृदयात् तम् अद्य अपि न विकृशति, यस्मात् दुर्मेधा भवन्तम् लवम् अपि न दवयति।
Summary
AI
What can I say to You? This foolish girl has attained this state of distress, O friend of *Vṛndāvana*’s flowers, solely through her own fault. The fire of grief does not drag Him from her heart even now, nor does her stubborn mind distance itself from You for even a moment.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | या | वा | च्यः | किं | वा | त्व | मि | ह | नि | ज | दो | षा | त्प | र | म | सौ |
| य | यौ | म | न्दा | वृ | न्दा | व | न | कु | सु | म | ब | न्धो | वि | धु | र | ताम् |
| य | द | र्थं | दुः | खा | ग्नि | र्वि | कृ | श | ति | त | म | द्या | पि | हृ | द | या |
| न्न | य | स्मा | द्दु | र्मे | धा | ल | व | म | पि | भ | व | न्तं | द | व | य | ति |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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