कृताकृष्टिक्रीडं किमपि तव रूपं मम सखी
सकृद्दृष्ट्वा दूरादहितहितबोधोज्झितमतिः ।
हता सेयं प्रेमानलमनु विशन्ती सरभसं
पतङ्गीवात्मानं मुरहर मुहुर्दाहितवती ॥
कृताकृष्टिक्रीडं किमपि तव रूपं मम सखी
सकृद्दृष्ट्वा दूरादहितहितबोधोज्झितमतिः ।
हता सेयं प्रेमानलमनु विशन्ती सरभसं
पतङ्गीवात्मानं मुरहर मुहुर्दाहितवती ॥
सकृद्दृष्ट्वा दूरादहितहितबोधोज्झितमतिः ।
हता सेयं प्रेमानलमनु विशन्ती सरभसं
पतङ्गीवात्मानं मुरहर मुहुर्दाहितवती ॥
अन्वयः
AI
मुर-हर, मम सखी सकृत् दूरात् तव कृत-आकृष्टि-क्रीडम् किम्-अपि रूपं दृष्ट्वा अहित-हित-बोध-उज्झित-मतिः, सा हता इयम् प्रेमा-अनलम् अनु सरभसं विशन्ती पतङ्गी इव आत्मानं मुहुः दाहितवती।
Summary
AI
O *Murahara*! My friend, having once seen from afar Your form which plays at attracting all, lost her sense of what is beneficial or harmful. Like a moth rushing into a flame, she has repeatedly burnt herself by entering the fire of love.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | ता | कृ | ष्टि | क्री | डं | कि | म | पि | त | व | रू | पं | म | म | स | खी |
| स | कृ | द्दृ | ष्ट्वा | दू | रा | द | हि | त | हि | त | बो | धो | ज्झि | त | म | तिः |
| ह | ता | से | यं | प्रे | मा | न | ल | म | नु | वि | श | न्ती | स | र | भ | सं |
| प | त | ङ्गी | वा | त्मा | नं | मु | र | ह | र | मु | हु | र्दा | हि | त | व | ती |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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