त्वया गोष्ठं गोष्ठीतिलक किल चेद्विस्मृतमिदं
न तूर्णं धूमोर्णापतिरपि विधत्ते यदि कृपाम् ।
अहर्वृन्दं वृन्दावनकुसुमपालीपरिमलैर्
दरालोकं शोकास्पदमिव कथं नेष्यति सखी ॥
त्वया गोष्ठं गोष्ठीतिलक किल चेद्विस्मृतमिदं
न तूर्णं धूमोर्णापतिरपि विधत्ते यदि कृपाम् ।
अहर्वृन्दं वृन्दावनकुसुमपालीपरिमलैर्
दरालोकं शोकास्पदमिव कथं नेष्यति सखी ॥
न तूर्णं धूमोर्णापतिरपि विधत्ते यदि कृपाम् ।
अहर्वृन्दं वृन्दावनकुसुमपालीपरिमलैर्
दरालोकं शोकास्पदमिव कथं नेष्यति सखी ॥
अन्वयः
AI
गोष्ठी-तिलक, यदि त्वया इदम् गोष्ठम् विस्मृतम्, धूमोर्णा-पतिः अपि यदि तूर्णं कृपाम् न विधत्ते, (तर्हि) सखी वृन्दावन-कुसुम-पाली-परिमलैः शोक-आस्पदम् इव अहः-वृन्दं कथं दरालोकं न नेष्यति?
Summary
AI
O Ornament of the Assembly! If You have forgotten this cowherd village, and if the Lord of Death (*Yama*) does not quickly show mercy, how will my friend endure these days, which are as painful as a place of grief, made unbearable by the fragrances of *Vṛndāvana*’s flowers?
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | या | गो | ष्ठं | गो | ष्ठी | ति | ल | क | कि | ल | चे | द्वि | स्मृ | त | मि | दं |
| न | तू | र्णं | धू | मो | र्णा | प | ति | र | पि | वि | ध | त्ते | य | दि | कृ | पाम् |
| अ | ह | र्वृ | न्दं | वृ | न्दा | व | न | कु | सु | म | पा | ली | प | रि | म | लै |
| र्द | रा | लो | कं | शो | का | स्प | द | मि | व | क | थं | ने | ष्य | ति | स | खी |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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