अये कुञ्जद्रोणीकुहरगृहमेधिन् किमधुना
परोक्षं वक्ष्यन्ते पशुपरमणीदुर्नियतयः ।
प्रवीणा गोपीनां तव चरणपद्मेऽपि यदियं
ययौ राधा साधारणसमुचितप्रश्नपदवीम् ॥
अये कुञ्जद्रोणीकुहरगृहमेधिन् किमधुना
परोक्षं वक्ष्यन्ते पशुपरमणीदुर्नियतयः ।
प्रवीणा गोपीनां तव चरणपद्मेऽपि यदियं
ययौ राधा साधारणसमुचितप्रश्नपदवीम् ॥
परोक्षं वक्ष्यन्ते पशुपरमणीदुर्नियतयः ।
प्रवीणा गोपीनां तव चरणपद्मेऽपि यदियं
ययौ राधा साधारणसमुचितप्रश्नपदवीम् ॥
अन्वयः
AI
अये कुञ्ज-द्रोणी-कुहर-गृह-मेधिन्, अधुना परोक्षं पशुप-रमणी-दुर्नियतयः किम् वक्ष्यन्ते? यत् इयम् गोपीनां प्रवीणा तव चरण-पद्मे अपि साधारण-समुचित-प्रश्न-पदवीम् ययौ।
Summary
AI
O dweller of the caves and bower-valleys! Why speak of the misfortunes of the cowherd women in their absence? For even she, the most expert among the *Gopīs* (*Rādhā*), has reached a state where she asks common, simple questions about Your lotus feet.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ये | कु | ञ्ज | द्रो | णी | कु | ह | र | गृ | ह | मे | धि | न्कि | म | धु | ना |
| प | रो | क्षं | व | क्ष्य | न्ते | प | शु | प | र | म | णी | दु | र्नि | य | त | यः |
| प्र | वी | णा | गो | पी | नां | त | व | च | र | ण | प | द्मे | ऽपि | य | दि | यं |
| य | यौ | रा | धा | सा | धा | र | ण | स | मु | चि | त | प्र | श्न | प | द | वीम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.