अयं पूर्वो रङ्गः किल परिचितो यस्य तरसा
रसादाख्यातव्यं परिकलय तन् नाटकमिदम् ।
मया प्रष्टव्योऽसि प्रथममिति वृन्दावनपते
किमाहा राधेति स्मरसि हतकं वर्णयुगलम् ॥
अयं पूर्वो रङ्गः किल परिचितो यस्य तरसा
रसादाख्यातव्यं परिकलय तन् नाटकमिदम् ।
मया प्रष्टव्योऽसि प्रथममिति वृन्दावनपते
किमाहा राधेति स्मरसि हतकं वर्णयुगलम् ॥
रसादाख्यातव्यं परिकलय तन् नाटकमिदम् ।
मया प्रष्टव्योऽसि प्रथममिति वृन्दावनपते
किमाहा राधेति स्मरसि हतकं वर्णयुगलम् ॥
अन्वयः
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अयम् पूर्वः रङ्गः किल यस्य तरसा रसात् परिचितः, इदम् नाटकम् परिकलय। वृन्दावन-पते, मया प्रथमम् इति प्रष्टव्यः असि, हतकं 'राधा' इति वर्ण-युगलम् किम् आहा (इति) स्मरसि?
Summary
AI
This was indeed the prologue, known through the speed of emotion; now behold this drama. O Lord of *Vṛndāvana*, I must first ask You this: do You remember what the cursed two syllables '*Rādhā*' mean?
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | यं | पू | र्वो | र | ङ्गः | कि | ल | प | रि | चि | तो | य | स्य | त | र | सा |
| र | सा | दा | ख्या | त | व्यं | प | रि | क | ल | य | त | न्ना | ट | क | मि | दम् |
| म | या | प्र | ष्ट | व्यो | ऽसि | प्र | थ | म | मि | ति | वृ | न्दा | व | न | प | ते |
| कि | मा | हा | रा | धे | ति | स्म | र | सि | ह | त | कं | व | र्ण | यु | ग | लम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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