प्रसूतो देवक्या मधुमथन यः कोऽपि पुरुषः
स यातो गोपालाभ्युदयपरमानन्दवसतिम् ।
धृतो यो गान्धिन्या कठिनजठरे सम्प्रति ततः
समन्तादेवास्तं शिव शिव गता गोकुलकथा ॥
प्रसूतो देवक्या मधुमथन यः कोऽपि पुरुषः
स यातो गोपालाभ्युदयपरमानन्दवसतिम् ।
धृतो यो गान्धिन्या कठिनजठरे सम्प्रति ततः
समन्तादेवास्तं शिव शिव गता गोकुलकथा ॥
स यातो गोपालाभ्युदयपरमानन्दवसतिम् ।
धृतो यो गान्धिन्या कठिनजठरे सम्प्रति ततः
समन्तादेवास्तं शिव शिव गता गोकुलकथा ॥
अन्वयः
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मधु-मथन, यः कः अपि पुरुषः देवक्या प्रसूतः सः गोपाल-अभ्युदय-परम-आनन्द-वसतिम् यातः। यः सम्प्रति गान्धिन्याः कठिन-जठरे धृतः, ततः समन्तात् एव गोकुल-कथा अस्तम् गता। शिव शिव।
Summary
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O Slayer of *Madhu*! The one born of *Devakī* became the source of supreme joy for the cowherds' prosperity. But now that He is held within the hard heart of *Gāndhinī* (*Akrūra*’s mother), the very story of *Gokula* has vanished everywhere. Alas, alas!
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | सू | तो | दे | व | क्या | म | धु | म | थ | न | यः | को | ऽपि | पु | रु | षः |
| स | या | तो | गो | पा | ला | भ्यु | द | य | प | र | मा | न | न्द | व | स | तिम् |
| धृ | तो | यो | गा | न्धि | न्या | क | ठि | न | ज | ठ | रे | स | म्प्र | ति | त | तः |
| स | म | न्ता | दे | वा | स्तं | शि | व | शि | व | ग | ता | गो | कु | ल | क | था |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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