समीपे नीपानां त्रिचतुरदला हन्त गमिता
त्वया या माकन्दप्रियसहचरीभावनियतिम् ।
इयं सा वासन्ती गलदमलमाध्वीकपटली-
मिषादग्रे गोपीरमण रुदती रोदयती नः ॥
समीपे नीपानां त्रिचतुरदला हन्त गमिता
त्वया या माकन्दप्रियसहचरीभावनियतिम् ।
इयं सा वासन्ती गलदमलमाध्वीकपटली-
मिषादग्रे गोपीरमण रुदती रोदयती नः ॥
त्वया या माकन्दप्रियसहचरीभावनियतिम् ।
इयं सा वासन्ती गलदमलमाध्वीकपटली-
मिषादग्रे गोपीरमण रुदती रोदयती नः ॥
अन्वयः
AI
गोपी-रमण, हन्त, त्वया नीपानां समीपे त्रि-चतुर-दला या माकन्द-प्रिय-सहचरी-भाव-नियतिम् गमिता, इयम् सा वासन्ती गलत्-अमल-माध्वीक-पटली-मिषात् अग्रे रुदती नः रोदयती।
Summary
AI
O Lover of the *Gopīs*! That *Vāsantī* creeper near the *Nīpa* trees, which You treated as the dear companion of the mango tree when it had but three or four leaves, now weeps before us in the guise of dripping honey, making us weep too.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | मी | पे | नी | पा | नां | त्रि | च | तु | र | द | ला | ह | न्त | ग | मि | ता |
| त्व | या | या | मा | क | न्द | प्रि | य | स | ह | च | री | भा | व | नि | य | तिम् |
| इ | यं | सा | वा | स | न्ती | ग | ल | द | म | ल | मा | ध्वी | क | प | ट | ली |
| मि | षा | द | ग्रे | गो | पी | र | म | ण | रु | द | ती | रो | द | य | ती | नः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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