पुरातिष्ठन् गोष्ठान् निखिलरमणीभ्यः प्रियतया
भवान् यस्यां गोपीरमण विदधे गौरवभरम् ।
सखी तस्या विज्ञापयति ललिता धीरललित
प्रणम्य श्रीपादाम्बुजकनकपीठीपरिसरे ॥
पुरातिष्ठन् गोष्ठान् निखिलरमणीभ्यः प्रियतया
भवान् यस्यां गोपीरमण विदधे गौरवभरम् ।
सखी तस्या विज्ञापयति ललिता धीरललित
प्रणम्य श्रीपादाम्बुजकनकपीठीपरिसरे ॥
भवान् यस्यां गोपीरमण विदधे गौरवभरम् ।
सखी तस्या विज्ञापयति ललिता धीरललित
प्रणम्य श्रीपादाम्बुजकनकपीठीपरिसरे ॥
अन्वयः
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गोपी-रमण, धीर-ललित, पुरा भवान् निखिल-रमणीभ्यः प्रियतया यस्यां गौरव-भरम् विदधे, तस्याः सखी ललिता श्री-पाद-अम्बुज-कनक-पीठी-परिसरे प्रणम्य विज्ञापयति।
Summary
AI
O Lover of the *Gopīs*, O *dhīralalita* hero! Your beloved, whom You once honored above all women in the cowherd village, has a friend named *Lalitā*. She bows at the edge of the golden pedestal of Your lotus feet and submits this message.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | रा | ति | ष्ठ | न्गो | ष्ठा | न्नि | खि | ल | र | म | णी | भ्यः | प्रि | य | त | या |
| भ | वा | न्य | स्यां | गो | पी | र | म | ण | वि | द | धे | गौ | र | व | भ | रम् |
| स | खी | त | स्या | वि | ज्ञा | प | य | ति | ल | लि | ता | धी | र | ल | लि | त |
| प्र | ण | म्य | श्री | पा | दा | म्बु | ज | क | न | क | पी | ठी | प | रि | स | रे |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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