यदा वृन्दारण्यस्मरणलहरीहेतुरमणं
पिकानां वेवेष्टि प्रतिहरितमुच्चैः कुहुरुतम् ।
वहन्ते वा वाताः स्फुरति गिरिमल्लीपरिमला-
स्तदैवास्माकीनां गिरमुपहरेथा मुरभिदि ॥
यदा वृन्दारण्यस्मरणलहरीहेतुरमणं
पिकानां वेवेष्टि प्रतिहरितमुच्चैः कुहुरुतम् ।
वहन्ते वा वाताः स्फुरति गिरिमल्लीपरिमला-
स्तदैवास्माकीनां गिरमुपहरेथा मुरभिदि ॥
पिकानां वेवेष्टि प्रतिहरितमुच्चैः कुहुरुतम् ।
वहन्ते वा वाताः स्फुरति गिरिमल्लीपरिमला-
स्तदैवास्माकीनां गिरमुपहरेथा मुरभिदि ॥
अन्वयः
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यदा पिकानां उच्चैः कुहू-रुतम् प्रति-हरितं वृन्दारण्य-स्मरण-लहरी-हेतु-रमणम् वेवेष्टि, वा वाताः वहन्ते, गिरि-मल्ली-परिमलाः स्फुरति, तदा एव मुर-भिदि अस्माकीनां गिरम् उपहरेथाः।
Summary
AI
When the loud 'kuhū' calls of cuckoos, which trigger waves of remembrance of *Vṛndāvana*, pervade every direction, or when the breezes blow carrying the fragrance of mountain jasmine, only then should you deliver our words to *Murabhid* (*Kṛṣṇa*).
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दा | वृ | न्दा | र | ण्य | स्म | र | ण | ल | ह | री | हे | तु | र | म | णं |
| पि | का | नां | वे | वे | ष्टि | प्र | ति | ह | रि | त | मु | च्चैः | कु | हु | रु | तम् |
| व | ह | न्ते | वा | वा | ताः | स्फु | र | ति | गि | रि | म | ल्ली | प | रि | म | ला |
| स्त | दै | वा | स्मा | की | नां | गि | र | मु | प | ह | रे | था | मु | र | भि | दि |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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