विलोकेथाः कृष्णः मदकलमरालीरतिकला-
विमुग्ध व्यामुग्धं यदि पुरवधूविभ्रमभरैः ।
तदा नास्मान् ग्राम्याः प्रवणपदवीं तस्य गमयेः
सुधापूर्णं चेतः कथमपि न तक्रं मृगयते ॥
विलोकेथाः कृष्णः मदकलमरालीरतिकला-
विमुग्ध व्यामुग्धं यदि पुरवधूविभ्रमभरैः ।
तदा नास्मान् ग्राम्याः प्रवणपदवीं तस्य गमयेः
सुधापूर्णं चेतः कथमपि न तक्रं मृगयते ॥
विमुग्ध व्यामुग्धं यदि पुरवधूविभ्रमभरैः ।
तदा नास्मान् ग्राम्याः प्रवणपदवीं तस्य गमयेः
सुधापूर्णं चेतः कथमपि न तक्रं मृगयते ॥
अन्वयः
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मद-कल-मराली-रति-कला-विमुग्ध, यदि कृष्णः पुर-वधू-विभ्रम-भरैः व्यामुग्धं विलोकेथाः, तदा अस्मान् ग्राम्याः तस्य प्रवण-पदवीम् मा गमयेः, (यतः) सुधा-पूर्णं चेतः कथं-अपि तक्रं न मृगयते।
Summary
AI
O swan, enchanted by the amorous arts of the intoxicated female swan! If you find *Kṛṣṇa* captivated by the seductive charms of city women, do not mention us rustic girls to Him. A heart filled with nectar never seeks out buttermilk.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | लो | के | थाः | कृ | ष्णः | म | द | क | ल | म | रा | ली | र | ति | क | ला |
| वि | मु | ग्ध | व्या | मु | ग्धं | य | दि | पु | र | व | धू | वि | भ्र | म | भ | रैः |
| त | दा | ना | स्मा | न्ग्रा | म्याः | प्र | व | ण | प | द | वीं | त | स्य | ग | म | येः |
| सु | धा | पू | र्णं | चे | तः | क | थ | म | पि | न | त | क्रं | मृ | ग | य | ते |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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